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300 फिल्में करने वाले दिनेश हिंगू का छलका दर्द : 86 की उम्र में काम करने की मजबूरी

अपनी अनोखी हंसी और बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से दशकों तक दर्शकों को लोटपोट करने वाले दिग्गज अभिनेता दिनेश हिंगू आज एक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। 300 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके 86 वर्षीय हिंगू ने हाल ही में अपनी निजी जिंदगी और आर्थिक तंगी को लेकर जो खुलासे किए हैं, उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के चकाचौंध के पीछे के कड़वे सच को उजागर कर दिया है। पीढ़ियों को हंसाने वाला यह कलाकार आज अपने बुनियादी इलाज और दवाइयों के खर्च के लिए संघर्ष कर रहा है।

एक हालिया बातचीत में दिनेश हिंगू ने बताया कि वह आज भी अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए काम की तलाश में रहते हैं और शूटिंग पर जाते हैं। उन्होंने अपना दर्द साझा करते हुए कहा :-

मैं 86 साल का हूं और आज भी कभी-कभी काम के लिए बाहर जाता हूं। हाल ही में मैं गिर गया था और मुझे चोट लग गई थी। अब ठीक हूँ, लेकिन डॉक्टर के पास जाने के लिए भी माल (पैसा) चाहिए ना। वो तो लूटते हैं… कभी कहते हैं 5000 लाओ, कभी 6000 रुपये लाओ।”

सपोर्टिंग एक्टर्स की कड़वी सच्चाई

दिनेश हिंगू ने उन कलाकारों की स्थिति पर प्रकाश डाला जो ‘लीड रोल’ में तो नहीं रहे, लेकिन जिन्होंने पूरी जिंदगी सिनेमा के नाम कर दी। उन्होंने बताया कि पुराने समय में कलाकारों और निर्देशकों को आज की तरह मोटा पैसा नहीं मिलता था।

एक ऐसा व्यक्ति जिसने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया है, जो दशकों से एक जाना-पहचाना चेहरा रहा है, उसे आज भी बुनियादी चिकित्सा खर्चों की चिंता सता रही है। यह फिल्म इंडस्ट्री में जिंदगी को बयां करता है, खासकर ऐसे एक्टर्स को जो कभी लीड रोल नहीं ले पाए लेकिन अनगिनत फिल्में कीं।

निर्देशकों और कलाकारों को इतना पैसा नहीं मिलता। मैंने ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों में काम किया है। मैंने गुजराती और राजस्थानी फिल्मों में भी काम किया है।

दिनेश हिंगू, एक्टर

कौन हैं दिनेश हिंगू?

13 अप्रैल, 1940 को बड़ौदा में जन्मे दिनेश हिंगू का भारतीय सिनेमा में लंबा और निरंतर सफर रहा है। भले ही उन्होंने हमेशा लीड रोल्स न किए हों, लेकिन उनकी प्रेजेंस को नजरअंदाज करना मुश्किल था। उनकी कॉमेडी, खासकर केवल अपने हाव-भाव और अलग आवाज से लोगों को हंसाने की उनकी क्षमता ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया। उन्होंने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत 1967 में आई फिल्म ‘तकदीर’ से की थी। अपने समय के कई एक्टर्स की तरह, उनकी सफलता रातोंरात नहीं मिली। यह एक के बाद एक फिल्म और एक के बाद एक रोल के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ने का सफर था। वर्षों के दौरान, उन्होंने कई तरह की फिल्मों में काम किया और धीरे-धीरे डायरेक्टर्स के भरोसेमंद चेहरों में से एक बन गए।

कॉमिक टाइमिंग से छाए, दिनेश हिंगू की फिल्में

हिंगू के करियर की असली पहचान उनकी निरंतरता थी। उन्होंने बड़े किरदारों या भारी-भरकम डायलॉग्स पर भरोसा नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने अपनी टाइमिंग, बॉडी लैंग्वेज और एक अनोखी हास्य शैली के दम पर अपनी एक अलग पहचान बनाई। ‘नमक हलाल’, ‘करण अर्जुन’, ‘हम आपके हैं कौन..!’, ‘कुली नंबर 1’ और ‘गुप्त’ जैसी फिल्मों में उन्होंने यादगार रोल किए।

फिल्म इंडस्ट्री की कड़वी सच्चाई

इतना काम करने के बावजूद, हिंगू का हालिया कमेंट एक ऐसी सच्चाई को उजागर करता है जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता। हर अभिनेता, खासकर सहायक रोल करने वाले, अपने जीवन के अंतिम वर्षों में आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं होते। सिनेमा की चकाचौंध फीकी पड़ जाती है, लेकिन रोजमर्रा के खर्चे नहीं। बात यह है कि दर्शकों के लिए, दिनेश हिंगू जैसे एक्टर उनके बचपन और पारिवारिक यादों का हिस्सा होते हैं। वे ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने गंभीर कहानियों में हंसी का पुट डाला।

86 साल में भी कर रहे काम

86 साल की उम्र में काम करते रहना अब सिर्फ जुनून की बात नहीं रह गई है। यह जीवन-मरण का सवाल है। डॉक्टर के खर्चों के बारे में उनका बयान सरल, लगभग अनौपचारिक सा है, लेकिन इसमें गहराई है। चिकित्सा खर्च, खासकर भारत में, तेजी से बढ़ सकते हैं और स्थिर आय या मजबूत वित्तीय सहायता के बिना, जाने-माने लोगों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

अनुभवी कलाकारों के बुढ़ापे का सहारा नहीं बनती इंडस्ट्री

इसका सीधा अर्थ यह है कि फिल्म इंडस्ट्री, अपनी तमाम प्रसिद्धि और लोकप्रियता के बावजूद, सभी के लिए लंबी स्थिरता की गारंटी नहीं देता। इससे यह सवाल उठता है कि अनुभवी कलाकारों को किस तरह सहायता दी जाती है और क्या उनके जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें उनका हक नहीं मिलना चाहिए!

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