छत्तीसगढ़

बलौदाबाजार की सांवरा बस्ती को पहचान का इंतजार : प्रशासनिक उलझन में सैकड़ों ग्रामीण मतदाता सूची से बाहर

बलौदाबाजार। जिला मुख्यालय से महज दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित कुकुरडी भाटा की सांवरा बस्ती एक बार फिर अपनी प्रशासनिक पहचान और मतदान के अधिकारों को लेकर सुर्खियों में है। वर्षों पहले शहर के विकास और व्यवस्था के लिए विस्थापित कर यहां बसाए गए सांवरा आदिवासी परिवार आज भी इस कशमकश में जी रहे हैं कि वे शहर के नागरिक हैं या गांव के।

इसी प्रशासनिक असमंजस और लापरवाही की वजह से बस्ती के सैकड़ों लोग मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं, जिससे आगामी 1 जून को होने वाले पंचायत उपचुनाव में वे अपने मताधिकार से वंचित रह सकते हैं।

सुविधाएं नगर पालिका की, योजनाएं पंचायत की

सांवरा बस्ती के प्रशासनिक ढांचे को देखें तो यह एक बेहद अजीब विडंबना को दर्शाता है। यहां रहने वाले परिवारों को बिजली, पानी, सड़क और राशन कार्ड जैसी बुनियादी सुविधाएं नगर पालिका बलौदाबाजार के माध्यम से मुहैया कराई जाती हैं। दूसरी तरफ, बच्चों के लिए आंगनबाड़ी, प्राथमिक स्कूल और कई ग्रामीण विकास योजनाओं का संचालन ग्राम पंचायत कुकुरडी के जरिए होता है। इन दो अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच पिस रहे इन परिवारों की आज तक कोई एक स्थायी पहचान तय नहीं हो सकी है, जिसका खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ रहा है।

मतदाता सूची से कटे नाम, नागरिकों में भारी आक्रोश

बस्तीवासियों का दर्द है कि प्रशासनिक खींचतान का सबसे बड़ा प्रहार उनके लोकतांत्रिक अधिकार पर हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार- कुछ समय पहले उन्हें नगर पालिका क्षेत्र की मतदाता सूची से यह कहकर बाहर कर दिया गया कि वे ग्रामीण क्षेत्र में आते हैं, जिससे वे नगरीय निकाय चुनाव में वोट नहीं डाल पाए।

अब जब 1 जून को ग्राम पंचायत के उपचुनाव होने वाले हैं, तो पता चला कि उनका नाम ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में भी शामिल नहीं है।लगातार चुनावों में मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने के कारण पूरी सांवरा बस्ती में प्रशासन के खिलाफ भारी नाराजगी और आक्रोश देखा जा रहा है।

14 साल बाद भी वही झुग्गी-झोपड़ी और बदहाली

विस्थापन के 14 साल बीत जाने के बाद भी सांवरा बस्ती के लोगों की जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। आज भी कई परिवार बुनियादी पक्के मकान के लिए तरस रहे हैं और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि पहचान स्पष्ट न होने (Urban vs Rural Status) के कारण उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला गैस कनेक्शन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग के चक्कर काटती रहती हैं।

वोट देने का अधिकार छीन लिया गया

हमसे हमारा सबसे बड़ा अधिकार यानी वोट देने का अधिकार छीन लिया गया है। कभी हमें शहर का बता दिया जाता है तो कभी गांव का। प्रशासन हमारी स्थिति को स्पष्ट करे और हमारा नाम मतदाता सूची में जोड़कर इस समस्या का स्थायी समाधान निकाले।

सांवरा बस्ती के पीड़ित निवासी

जनता के इस हक की जिम्मेदारी लेगा कौन?

जब टैक्स वसूलने और सुविधाएं देने के लिए नगर पालिका और पंचायत दोनों व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तो फिर इन नागरिकों की पहचान तय करने और इन्हें मतदान का अधिकार दिलाने की जिम्मेदारी किसकी है? सांवरा बस्ती के सैकड़ों परिवार आज जिला प्रशासन के सामने यही यक्ष प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। देखना होगा कि 1 जून के चुनाव से पहले प्रशासन कोई आपात कदम उठाता है या फिर इन विस्थापितों को एक बार फिर लोकतंत्र के इस पर्व में केवल मूकदर्शक बनकर रहना पड़ेगा।

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