छत्तीसगढ़

बस्तर दशहरा का विजय रथ 600 साल पुरानी परंपरा : बिना कील और मशीन के होता है तैयार

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनूठी जनजातीय परंपराओं के लिए दुनियाभर में अलग पहचान रखता है। यहां दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के उत्सव से अलग, आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना और आदिवासी संस्कृति का महापर्व है।

इस पर्व की सबसे आकर्षक परंपराओं में विशाल रथ का संचालन शामिल है। खास बात यह है कि बस्तर दशहरा में चलने वाले रथ 1 नहीं, बल्कि 2 प्रकार के हैं। इनमें 8 पहियों वाला विशाल रथ विजय रथ कहलाता है, जो भीतर रैनी और बाहर रैनी को चलता है। लगभग 600 साल पुरानी इस परंपरा में आस्था, शिल्पकला और पुश्तैनी अधिकार का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

जगन्नाथ पुरी की यात्रा से जुड़ी है रथ परंपरा

लोकमान्यता के अनुसार, बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें रथपति की उपाधि और विशाल रथ प्राप्त हुआ। मान्यता है कि इस रथ में 16 पहिये थे। बस्तर तक इतने विशाल रथ को लाना और उसका संचालन करना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए इसे 3 हिस्सों में विभाजित किए जाने की परंपरा प्रचलित है।इनमें 4 पहियों वाला रथ जगन्नाथ की गोंचा परंपरा से जुड़ा, जबकि 4 पहियों वाला फूल रथ और 8 पहियों वाला विजय रथ बस्तर दशहरा की विशिष्ट पहचान है। फूल रथ नवरात्रि के दौरान 6 दिनों तक चलता है। वहीं विजय रथ अगले 2 दिन चलता है।

पारंपरिक काष्ठ शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण

फूल रथ का नाम उसकी सजावट से जुड़ा है, जबकि विजय रथ विजय और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।विजय रथ का निर्माण पारंपरिक काष्ठ शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके निर्माण में मुख्य रूप से साल की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है। आवश्यकता के अनुसार बीजा और सागौन जैसी लकड़ियों का भी उपयोग हो सकता है। निर्माण के लिए लकड़ी स्थानीय वन क्षेत्रों से जुटाई जाती है।

उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इसके लिए लगभग 55 घन मीटर लकड़ी की जरूरत पड़ती है, जिसे कई ट्रकों के माध्यम से लाया जाता है। इस विशाल रथ को तैयार करने में लगभग 15 दिन लगते हैं। कारीगर पारंपरिक औजारों, जैसे कुल्हाड़ी और बसूले की मदद से लकड़ी को आकार देते हैं। इसकी बनावट में पारंपरिक जोड़ और लकड़ी को आपस में फंसाने की तकनीक महत्वपूर्ण होती है। निर्माण प्रक्रिया में लोहे की कीलों और आधुनिक मशीनों के बजाय पारंपरिक कौशल को प्राथमिकता दिए जाने की मान्यता है।

2 गांवों के कारीगरों के पास पुश्तैनी जिम्मेदारी

विजय रथ के निर्माण की सबसे खास बात यह है कि इसकी जिम्मेदारी झाड़ उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के आदिवासी कारीगर परिवारों से जुड़ी हुई है। परंपरा के अनुसार, राजकाल में इन गांवों के बढ़ई और अन्य पारंपरिक शिल्पकार परिवारों को यह दायित्व सौंपा गया था। तभी से पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कला आगे बढ़ती रही है। कारीगरों के लिए यह केवल लकड़ी से रथ बनाने का काम नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर है। वे अपने पूर्वजों से सीखी तकनीकों के आधार पर विशाल लकड़ी के ढांचे को आकार देते हैं। रथ के अलग-अलग हिस्सों का संतुलन, पहियों की बनावट और जोड़ की मजबूती उनके अनुभव और कौशल की परीक्षा लेते हैं।

आस्था, श्रम और सामूहिकता का प्रतीक

विजय रथ का निर्माण बस्तर की सामुदायिक परंपरा को भी सामने लाता है। निर्माण से लेकर रथ संचालन तक अनेक लोग अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं। रथ जब सड़कों पर निकलता है, तो उसके साथ श्रद्धालुओं की आस्था, जनजातीय संस्कृति और सदियों पुरानी विरासत भी चलती दिखाई देती है।बस्तर दशहरा का विजय रथ इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक तकनीक के दौर में भी पारंपरिक ज्ञान किस तरह जीवित रह सकता है। इसकी विशालता केवल पहियों और लकड़ी के ढांचे में नहीं, बल्कि उन हाथों के हुनर में है, जो पीढ़ियों से इस परंपरा को संभाले हुए हैं।

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