बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में होलिका दहन की शुरुआत माड़पाल गांव से होती हैं। यहां होलिका दहन के बाद पूरे संभाग में होलिका दहन कर होली पर्व मनाया जाता है। माड़पाल की होली एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध परंपरा है, जो 600 वर्षों से मनाई जा रही है। इसे राजशाही होली के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इसकी शुरुआत बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव के काल में हुई थी। माड़पाल की होली बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें परंपरा, आस्था और शाही वैभव का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
राजा पुरुषोत्तम देव और रथ यात्रा का इतिहास
बस्तर में हर पर्व देवी आस्था से जुड़ी है। चाहे विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा हो या गोंचा महापर्व। दोनों पर्व में माता की छत्र और प्रभु जगन्नाथ को रथ में विराज कर परिक्रमा कराई जाती है। दोनों पर्व के बाद होली में भी रथ चलन की परंपरा है। कहा जाता है कि, 1408 में जब बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथपुरी से वापस लौट रहे थे। तब वापसी में माडपाल गांव पड़ा था, जहां के ग्रामीणों द्वारा अपने राजा का स्वागत कर उन्हें गांव लाया था।
पहली होलिका दहन माड़पाल से शुरू की गई
राजा पुरुषोत्तम देव को गांव के लोगों ने उनके जैसा ही एक रथ बनाया और गांव की परिक्रमा करायी। इसके बाद शाही अंदाज में पहुंचे राजा ने मां मावली, मां दंतेश्वरी की पूजा- अर्चना कर होलिका दहन किया था और उसके अग्नि को अपने राजमहल ले जाकर होलिका दहन किया। ऐसे में पहली होलिका दहन माड़पाल से शुरू की गई। उसके बाद ही पूरे संभाग में होलिका दहन कर होली पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और यह ऐतिहासिक परम्परा आज भी अनवरत जारी है।
मावली माता की जाती है पूजा
इस होली की शुरुआत मावली माता की विशेष पूजा-अर्चना से होती है, जो राजपरिवार द्वारा संपन्न की जाती है। इसके बाद, विशाल रथारोहण की परंपरा निभाई जाती है, जो बस्तर दशहरे की तर्ज पर होती है। इस उत्सव में सात प्रकार की पवित्र लकड़ियों से होलिका दहन किया जाता है। जिनका धार्मिक महत्व काफी है। यह आयोजन न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। हजारों श्रद्धालु और पर्यटक हर साल इस आयोजन में शामिल होकर बस्तर की पहली होली को करीब से देखते हैं।
आस्था, प्रेम विश्वास और भाईचारे का महा पर्व
बस्तर राज परिवार के सदस्य ने कहा कि, आस्था, प्रेम विश्वास और भाईचारे का महा पर्व में होली की खूबसूरत तस्वीर तो लगातार देखने को मिलती हैं, लेकिन बस्तर की यह खास होली ऐतिहासिक होली से कम नहीं। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परम्परा आज भी बस्तर में कायम है।






